लाइब्रेरियन मैडम का मुख चोदन

दोस्तो, मेरा नाम गौतम है… और ये कहानी उस जमाने की है जब मैं कॉलेज की दीवारों के बीच घुटन भरी जवानी लेकर घूम रहा था।

मैं बी.एड. का छात्र था। पढ़ाई में अव्वल, लेकिन लड़कियों के मामले में एकदम कच्चा। कभी किसी से दोस्ती तक नहीं की थी। मन में हमेशा डर रहता था—अगर लड़की नाराज़ हो गई तो? अगर हँसी उड़ा दी तो? लेकिन किस्मत ने मेरे लिए एक ऐसी औरत चुनी थी जो उम्र में मुझसे दस साल बड़ी थी… और भूख में मुझसे कहीं ज्यादा।

हमारे कॉलेज की लाइब्रेरियन—निशा मैडम। लगभग पैंतीस साल की, हल्के गेहुएँ रंग की, मध्यम कद की… लेकिन जब वो चलती थीं तो पूरा कॉलेज उनके कूल्हों को घूरता रहता था। उनकी चाल में एक ऐसी लचक थी कि लड़के लाइब्रेरी के बाहर ही खड़े होकर निहारते रहते। वक्ष स्थल इतने भरे-पूरे थे कि ब्लाउज के बटन हमेशा तनाव में दिखते। पति विदेश में जॉब करते थे। वो सास-ससुर के साथ रहती थीं।

दीवाली की छुट्टियाँ नजदीक थीं। कॉलेज लगभग खाली पड़ चुका था। लेकिन मैं रोज आता था। एक दोपहर लाइब्रेरी में घुसा तो मैडम ने अचानक कहा,

“गौतम… प्लीज़ मेरी मदद कर दो। कुछ किताबों की एक्सेल शीट बनानी है और मेल करनी है। तुम टाइप कर लो, मैं नाम बताती रहूँगी।”

मैंने हाँ कर दी।

मैडम किताबें ऊपर-नीचे ढूँढ रही थीं। और मेरी नज़रें… उनकी छातियों पर चिपक गई थीं। आज शायद ब्रा नहीं पहनी थी। कपड़े के अंदर से गोल-गोल आकार बाहर की तरफ धकेल रहे थे। हर बार जब वो झुकतीं, तो मेरा गला सूख जाता। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।

अचानक उनकी नज़र मुझ पर पड़ी।

उन्होंने दुपट्टे से खुद को ढँक लिया और आवाज़ में गुस्सा भरकर बोलीं, “गौतम! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? ये क्या देख रहे हो?”

मैंने सिर झुकाकर माफी माँगी और भाग निकला।

गाँव पहुँचकर भी मन शांत नहीं हुआ। डरते-डरते हैप्पी दीवाली का मैसेज भेजा। कोई जवाब नहीं आया। लगा, नाराज़गी अभी बाकी है।

रात के बारह बजे फोन बजा।

सामने से एक महिला की आवाज़—“हैप्पी दीवाली, गौतम।”

निशा मैडम थीं।

थोड़ी देर बातचीत के बाद अचानक पूछा, “एक बात सच-सच बताओ… तुम्हारी कोई गर्लफ्रेंड है?”

“नहीं मैडम। आज तक किसी से दोस्ती तक नहीं की।”

थोड़ी चुप्पी के बाद उनकी आवाज़ थोड़ी नरम हो गई, “तो… क्या तुम मुझसे दोस्ती करोगे? लेकिन कॉलेज में ये बात किसी को पता नहीं चलनी चाहिए।”

मैंने बिना सोचे हाँ कह दी।

उस रात के बाद फोन की रातें लंबी हो गईं। धीरे-धीरे बातें खुलने लगीं। सेक्स की बातें भी आने लगीं। एक रात हिम्मत करके बोला,

“मैडम… मुझे बस एक बार… बिना कपड़ों के देखना है।”

पहले मना किया। फिर जब बहुत जिद की तो मान गईं। “आ जाओ… लेकिन सावधानी से।”

मैं तैयार होकर उनके घर पहुँचा। सास-ससुर बाहर गए हुए थे। मैडम ने सोफे पर बिठाया और किचन में चाय बनाने चली गईं।

थोड़ी देर बाद मैं भी किचन में चला गया।

वो मुस्कुरा रही थीं। गैस बंद किया… और अगले ही पल हम दोनों एक-दूसरे के होंठों पर टूट पड़े।

मैडम की भूख साफ झलक रही थी। वो मेरे होंठों को ऐसे चूस रही थीं जैसे कोई भूखा बच्चा कैंडी चूसे। उनकी जीभ मेरे मुँह में घूम रही थी। साँसें तेज हो रही थीं।

फिर उन्होंने खुद ही अपना कुर्ता उतार फेंका।

काली ब्रा में उनकी बड़ी-बड़ी छातियाँ बाहर को धकेल रही थीं। मैं पागलों की तरह झपटा। ब्रा के ऊपर से ही चूसने लगा, दबाने लगा। मैडम कराह उठीं।

थोड़ी देर बाद उनकी हथेली मेरे पैंट पर चली गई। लंड बुरी तरह अकड़ा हुआ था। उन्होंने हँसते हुए कहा,

“मुझसे अब रुका नहीं जा रहा… पैंट और अंडरवियर उतार दो।”

मैंने झट से उतार दिए।

मैडम घुटनों पर बैठ गईं। मेरे खड़े लंड को हाथ में लेकर एक पल निहारा… फिर मुँह में ले लिया।

गरम, गीली जीभ ने लंड को चारों तरफ से चाटा। फिर गहरे में ले गईं—इतना गहरा कि गले तक छू गया। मैं सीत्कार भर उठा। उनके बालों को पकड़कर धीरे-धीरे धक्के मारने लगा। मैडम बड़बड़ा रही थीं, गले से आवाज़ें निकाल रही थीं, लेकिन रुक नहीं रही थीं। वो मेरे लंड को पूरा निगल रही थीं, चाट रही थीं, चूस रही थीं जैसे सालों से भूखी हों।

पाँच मिनट भी नहीं बीते होंगे कि मेरे शरीर में बिजली दौड़ गई। मैं काँपते हुए उनके मुँह में झड़ गया। पूरा माल उनके गले में उतार दिया। मैडम ने एक बूँद भी बाहर नहीं गिरने दी। धीरे-धीरे चाटते हुए लंड साफ किया और ऊपर देखकर मुस्कुराईं।

मैं अभी भी अधमरा सा खड़ा था। उन्हें चोदने का मन कर रहा था… लेकिन तभी उनका फोन बज उठा। सास-ससुर वापस आ रहे थे।

हम दोनों ने हड़बड़ी में कपड़े पहन लिए।

उस रात मैडम ने मुझे सिर्फ मुँह से चोदा था… लेकिन उनके चेहरे पर जो भूख बची थी, वो साफ कह रही थी—अगली मुलाकात में वो मुझे बाकी सब कुछ सिखाएँगी।

दोस्तो, ये मेरी पहली माउथ फक स्टोरी है।
कैसी लगी?

शुभ रात्रि।

By Admin

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