मैं 26 साल की शादीशुदा औरत हूँ। मई 2017 में मेरी शादी हुई थी। तीन साल बीत गए, पेट खाली रहा। डॉक्टर ने साफ कह दिया था—पति के शुक्राणु कम हैं। यह बात मैंने किसी को नहीं बताई। सास की नज़रें दिन-ब-दिन तीखी होती गईं। आखिर 15 मार्च 2020 को उन्होंने जबरदस्ती मुझे मायके छोड़ दिया।
मायके में माँ-पिता, भाई और भाभी थे। भाई की दो बेटियाँ। घर में हँसी-खुशी का माहौल था, लेकिन मेरे अंदर एक खालीपन साँप की तरह रेंग रहा था।
4 अप्रैल 2020 की रात।
गर्मी इतनी कि साँस घुट रही थी। लाइट नहीं थी। माँ-पिता छत पर सोए थे बड़ी पोती के साथ। भाभी छोटी बेटी लेकर छत चली गईं। मैं अकेली कमरे में नाइटी पहनकर लेटी थी। बाहर गाँव में शादी थी। भाई वहीं गए थे।
रात के ग्यारह बजे दरवाज़ा खुला। शराब की तेज़ गंध कमरे में फैल गई। अँधेरे में कोई बिस्तर पर आ गिरा। भारी साँसें। गर्म हाथ।
पहले उन्होंने मेरी कमर पकड़ी। फिर छाती पर हाथ रखा। उँगलियाँ नाइटी के अंदर घुस गईं। चुचियों को मसलने लगे—जैसे रोज़ मसलते होंगे। मैं अकड़ गई। मुँह खोलना चाहती थी, लेकिन गला सूख गया। अँधेरा इतना गहरा था कि चेहरा नहीं दिख रहा था।
वे मेरे ऊपर चढ़ आए। होंठ मेरे होंठों पर आ गिरे। जीभ अंदर घुस गई। शराब और सिगरेट का स्वाद। हाथ नीचे सरके। नाइटी ऊपर उठी। ब्रा खोली गई। जाँघिया खींच ली गई। मैं पूरी नंगी हो चुकी थी और वो भी।
उनका लंड मेरी जांघ पर ठोक रहा था—गरमागरम, सख्त। दो उँगलियाँ मेरी चूत में घुस गईं। गीलापन फैल रहा था, चाहे मैं रोकना चाहती। वे थूक लगाकर और गीला कर रहे थे। फिर लंड का सुपड़ा चूत के मुँह पर टिका। एक जोर का धक्का।
दर्द ने आँखों से आँसू निकाल दिए। मैंने होंठ काट लिए ताकि आवाज़ न निकले। छत पर परिवार सो रहा था। भतीजी बगल वाले बिस्तर पर थी। एक भी चीख सब कुछ खत्म कर सकती थी।
वे पूरे जोर से धक्के लगाने लगे। “पूजा… आज तेरी चूत कितनी टाइट है…”
मेरी भाभी का नाम। मेरा खून ठंडा पड़ गया। वे अपनी पत्नी समझ रहे थे। मैं बहन थी।
बीस मिनट तक शरीर हिलता रहा। हर ठोकर बच्चेदानी तक जा रही थी। आखिर में उन्होंने अंदर ही वीर्य छोड़ दिया—गर्म, गाढ़ा, बहुत सारा। फिर मेरे ऊपर ही ढेर हो गए।
मैं काँप रही थी। धीरे-धीरे उनका लंड बाहर निकाला। उन्हें एक तरफ सरकाया। भतीजी की तरफ देखा—वह गहरी नींद में थी। मैंने नाइटी ओढ़ ली और अँधेरे में आँखें फाड़े पड़ी रही।
सुबह तीन बजे।
उनके हाथ फिर मेरे शरीर पर फिरने लगे। अचानक वे रुक गए। शरीर सख्त हो गया। लाइट जल गई।
मेरे भाई नंगे खड़े थे। उनकी आँखों में दहशत। मुँह खुला का खुला रह गया। फिर वे दीवार से लगकर फफक पड़े।
“बहन… माफ़ कर दे… मैं… मैं नशे में था… मुझे कुछ याद नहीं… भगवान कसम…”
मैं भी रो पड़ी। सालों की बेबसी, सास की तिरस्कार भरी आँखें, पति का कमजोर शरीर—सब एक साथ फूट पड़ा। मैं उठी और नंगे ही उन्हें गले लगा लिया। उनका शरीर काँप रहा था। मेरा भी।
“भाई…” मेरी आवाज़ टूट रही थी, “जीजू के शुक्राणु काम के नहीं। सास-ससुर ने इसलिए निकाल दिया। मुझे माँ बनना है… तुम… तुम मुझे माँ बना दो।”
उनकी साँसें भारी हो गईं। आँखों में अभी भी आँसू थे, लेकिन लंड फिर से उठ चुका था। उन्होंने मेरे होंठ चूमे—इस बार जानकर। नाइटी फिर उतरी।
इस बार दोनों जाग रहे थे। दोनों जानते थे।
उन्होंने शहद लगाया और मेरा मुँह अपने लंड की तरफ धकेला। मैंने पहले मना किया, फिर धीरे-धीरे ले लिया। सरसों के तेल से मेरी चूत की मालिश की—धीमी, गहरी, उँगलियों से अंदर तक। फिर दूसरी बार घुसेड़ दिया।
इस बार दर्द कम था, तड़प ज़्यादा। मैं उनके कान में साँस छोड़ते हुए बोली, “आज ठहर जाए… तो ससुराल जाकर जीजू से भी कर लूँगी… शक नहीं होगा।”
वे और तेज़ हो गए। पच्चीस मिनट बाद फिर अंदर छोड़ दिया। मेरे बालों में उँगलियाँ फँसाए हुए फुसफुसाए, “बहन… माँ बनने के बाद भी… दोगी ना?”
मैंने आँखें बंद करके सिर हिलाया। “जब चाहो… अकेले में… ले लेना।”
सुबह होते-होते उन्होंने मुझे ससुराल छोड़ दिया। उस रात मैंने पति से जानबूझकर बार-बार संबंध बनाए। अगले महीने मासिक धर्म नहीं आया। दिसंबर 2020 में बेटा पैदा हुआ।
अब जब भी मायके जाती हूँ, भाई और मैं वो रात दोहराते हैं। ससुराल में पति का शरीर मिलता है, मायके में भाई का। बेटे को गोद में लेकर कभी-कभी भाई मुस्कुराते हुए कहते हैं, “ये तो मेरा भी है… और तेरा भी।”
और मैं चुपचाप सिर हिला देती हूँ।